ठिठरिया णु बाजे पैजनिया,
प्रीतम आवो नी इण बरखा ...
सैया ! सतावो ना ,ना सतावो इण जिया ने ,
प्रीतम आवो नी इण बरखा ...
नीले गीले से मौसम के आशियाने में,
खोने मिलने में मज़ें हैं आने वाले रे…
हौले हौले से हो जाएँगे तुम्हारे हम,
जो हैं होने लगे,
लगने मिलने गले हैं क्यों… क्यों ये सितम ?
घड़ियों के सुओ ने हैं क्यों,ये रुख मोड़ लिए ?
चन्दा ने सूरज से हैं क्यों,ये पल जोड़ लिए ?
छलके सावन के बदली से प्यारी बूँदें,
गोते लग जाने दे,दरिया में मिलेंगे ...
धीरे धीरे से आओगे जब तुम,
लगा दूंगा कजला ,
कजला तेरे कानो के पीछे…पीछे से गुमसुम
पंछियों ने सभी सरहदों को,ऐसे ही पार हैं लिए,
मैंने तुझको चुना हैं,तू चुनले मुझे…
ठिठरिया णु बाजे पैजनिया,
प्रीतम आवो नी इण बरखा ...
सैया ! सतावो ना ,ना सतावो इण जिया ने ,
प्रीतम आवो नी इण बरखा ...
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